Good days for Congressmen in Priyanka’s branding: The pockets of Amethi District President, City President and Block President also became hot, only then the party would be strong if they would be seen on the ground


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अमेठी16 मिनट पहले

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1989 के बाद से यूपी में कांग्रेस का ग्राफ गिरता गया। कोशिशें बहुत हुई लेकिन हर प्रयास निरर्थक ही रहा। 2012 और 2017 के असेंबली इलेक्शन में प्रियंका गांधी चुनाव में बतौर स्टार प्रचारक उतरीं। इसका बेनिफिट भी पार्टी को नहीं मिला। हालांकि एक दशक बाद नेतृत्व ने प्रियंका को यूपी का होल सोल इंचार्ज बनाकर भेजा है। उनकी ब्रांडिंग पर पानी की तरह पैसे भी खर्च हो रहा है। अब

इसका रिजल्ट क्या है वो साल 2022 के चुनावी नतीजे ही बताएंगे। यही नहीं यूपी के लखीमपुर, उन्नाव आदि जिलों में प्रियंका के ताबड़तोड़ दौरे, यहां के मुद्दों को कैश कराकर जनता में पार्टी के प्रति अच्छा संदेश देने के लिए खासी मेहनत की गई।

20 हजार महीन मिलेगा

सूत्र बताते हैं कि लाखों रुपए खर्च कर दिए गए। हां, स्ट्रैटजी काम आई और बूझ चुके चिराग की लौ फिर से उठने लगी। जिसका इफेक्ट सत्ता तो सत्ता विपक्ष पर भी देखने को मिला। सूत्र तो यहां तक बताते हैं कि प्रियंका की रात-दिन इस मेहनत के साथ-साथ जिला स्तर पर कांग्रेस को मजबूत करने का प्लान हुआ। उनके द्वारा उठाए गए प्रमुख मुद्दे और सरकार की नाकामियां जनता के मध्य पहुंचाने के लिए जिला-शहर और ब्लॉक स्तर पर संगठन को धार दी गई।

लखनऊ की मीटिंग के बाद पालिसी बनी। सूत्रों के मुताबिक पार्टी जिलाध्यक्ष को फील्ड में भाग दौड़ के लिए बीस हजार प्रति माह तो शहर अध्यक्ष को 10 और ब्लॉक अध्यक्ष को 5हजार प्रति माह की सम्मान राशि प्रदान की जा रही।

पिछले चुनाव में ये रहा हाल
शहर और ब्लॉक स्तर पर संगठन को मजबूत करने का काम पार्टी में तेजी से चल रहा है़। कहीं चौपाल तो कहीं डोर टू डोर कांग्रेसी जनता के बीच पहुंचने भी लगे हैं। 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव में इस बात की कांग्रेस में बड़ी कमी थी।

नतीजा यह हुआ था कि 2017 के विधानसभा चुनाव में प्रियंका के प्रचार के बावजूद अमेठी की चार विधानसभा में से तीन बीजेपी और एक सपा की झोली में गई थी। रायबरेली की 6 सीटों में दो कांग्रेस, तीन बीजेपी और एक सपा को मिली थी। पड़ोसी जिले सुलतानपुर में तो कांग्रेस 5 में से एक सीट पर सम्मान जनक स्थित में नही थी। वजह साफ थी संगठन की कमी और मैनेजमेंट का अभाव।

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